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Naya Basera: बाढ़ के बाद रामदीन काका ने कैसे बदला अपना नसीब?

सब कुछ खोकर भी हार न मानने की जिद्द ही इंसान को महान बनाती है। पढ़िए रामदीन काका की यह भावुक कहानी जो सिखाती है कि आपदा अंत नहीं, एक नई शुरुआत है।

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Naya Basera: रामदीन काका और सपनों का पक्का घर

इंसान का जीवन भी अजीब है। हम ईंट-गारे से मकान बनाते हैं और उसे 'घर' कहते हैं। लेकिन जब कुदरत की मार पड़ती है और वह घर बिखर जाता है, तो असली परीक्षा शुरू होती है। यह कहानी 'सुंदरपुर' गाँव के एक मेहनती कुम्हाररामदीन काका की है। एक भयानक बाढ़ ने उनका पुश्तैनी घर और रोजी-रोटी छीन ली। लेकिन उन्होंने भीख मांगने या रोने के बजाय अपने पसीने से एक ऐसा Naya Basera खड़ा किया, जो पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत था।

कहानी: मिट्टी के बर्तन और लोहे का हौसला

नदी किनारे का वो कच्चा मकान

सुंदरपुर गाँव के बाहरी हिस्से में, नदी के किनारे एक छोटी सी कच्ची झोपड़ी थी। यह घर था रामदीन काका का। रामदीन काका गाँव के सबसे बेहतरीन कुम्हार थे। उनके बनाए मटके, सुराही और खिलौने दूर-दूर तक मशहूर थे।

उनके परिवार में उनकी पत्नी सुमित्रा और एक 10 साल की बेटी गुड़िया थी। घर कच्चा ज़रूर था, लेकिन खुशियों से पक्का था। रामदीन अक्सर शाम को अपनी बेटी से कहते, "गुड़िया, देख रही है ये चाक (Potter's Wheel)? इसी के सहारे एक दिन मैं तेरे लिए पक्का मकान बनाऊंगा।"

लेकिन नदी, जो उन्हें मिट्टी देती थी और उनकी रोज़ी-रोटी चलाती थी, एक दिन वही उनकी दुश्मन बन गई।

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विनाश की काली रात

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सावन का महीना था और बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। नदी का जलस्तर बढ़ता जा रहा था। गाँव के लोग सुरक्षित ऊँचे स्थानों पर जा रहे थे, लेकिन रामदीन को उम्मीद थी कि पानी उनकी झोपड़ी तक नहीं आएगा।

लेकिन वह रात कयामत बनकर आई। आधी रात को अचानक बांध का पानी छोड़ दिया गया। देखते ही देखते नदी ने रौद्र रूप धारण कर लिया। पानी की तेज़ धार रामदीन की झोपड़ी में घुस गई।

"भागो! सुमित्रा, गुड़िया को लो और टीले की तरफ दौड़ो!" रामदीन चिल्लाया। वे किसी तरह जान बचाकर ऊँचे टीले पर पहुँचे। लेकिन उनकी आँखों के सामने उनका प्यारा घर, उनकी मेहनत का चाक, और पकाए हुए हज़ारों रुपये के बर्तन पानी में बह गए।

सुबह तक सब कुछ शांत हो गया था, लेकिन रामदीन की दुनिया उजड़ चुकी थी। जहाँ कल तक उनका घर था, वहाँ अब सिर्फ कीचड़ और मलबा बचा था।

हौसले की परीक्षा

अगले दिन राहत शिविर में रामदीन काका गुमसुम बैठे थे। गाँव के सरपंच आए और बोले, "रामदीन भाई, बहुत बुरा हुआ। अब तुम क्या करोगे? चाहो तो शहर जाकर मजदूरी कर लो, यहाँ अब कुछ नहीं बचा।"

रामदीन ने अपनी रोती हुई बेटी गुड़िया को देखा। उसने सोचा, "अगर मैं टूट गया, तो मेरा परिवार बिखर जाएगा। मेरा घर टूटा है, मेरे हाथ नहीं।"

रामदीन ने सरपंच से कहा, "नहीं सरपंच जी, मैं अपना गाँव नहीं छोड़ूँगा। नदी ने मेरा कच्चा घर तोड़ा है, अब मैं उसे चुनौती देता हूँ। मैं यहीं, इसी ज़मीन पर अपना नया बसेरा बनाऊंगा, और इस बार ऐसा घर बनाऊंगा जिसे कोई बाढ़ हिला न सके।"

नया बसेरा: संघर्ष से सफलता तक

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रामदीन के पास पैसे नहीं थे, लेकिन उसके पास हुनर था। उसने गाँव के ईंट-भट्टे पर काम करना शुरू किया। दिन भर वह दूसरों के लिए ईंटें बनाता और बदले में मजदूरी के तौर पर पैसे नहीं, बल्कि 'पक्की ईंटें' मांगता।

गाँव वाले उसका मज़ाक उड़ाते। "पागल हो गया है रामदीन। खाने के लाले पड़े हैं और इसे पक्के मकान के सपने आ रहे हैं।"

लेकिन रामदीन ने कान बंद कर लिए। सुमित्रा और नन्हीं गुड़िया ने भी उसका साथ दिया। गुड़िया स्कूल से आकर पिता के साथ ईंटें ढोने में मदद करती। रामदीन दिन में भट्टे पर काम करता और रात को लालटेन की रोशनी में अपनी ज़मीन पर दीवारें खड़ी करता।

उसने घर की नींव (Foundation) बहुत ऊँची रखी, ताकि बाढ़ का पानी फिर कभी अंदर न आ सके। उसकी मेहनत देखकर धीरे-धीरे गाँव वाले भी पिघल गए। जो मज़ाक उड़ाते थे, वे अब सीमेंट और मदद लेकर आने लगे।

सपनों का गृह प्रवेश

छह महीने बीत गए। जहाँ कभी टूटी हुई झोपड़ी थी, वहाँ अब एक छोटा लेकिन सुंदर पक्का मकान खड़ा था। छत पक्की थी, दीवारें मज़बूत थीं और आंगन में रामदीन ने एक नया इलेक्ट्रिक चाक (Electric Wheel) भी लगा लिया था।

गृह प्रवेश के दिन पूरा गाँव इकट्ठा हुआ। रामदीन ने सबकी आँखों में सम्मान देखा। उसने अपनी बेटी गुड़िया को गोद में उठाया और कहा, "देख बेटा, मैंने कहा था न, हम पक्का मकान बनाएंगे। वो तूफ़ान हमें बर्बाद करने नहीं, बल्कि हमें यह बताने आया था कि हम इससे बेहतर के लायक हैं।"

आज रामदीन काका का घर न सिर्फ बाढ़ से सुरक्षित है, बल्कि उनके बर्तनों का काम भी दोगुना बढ़ गया है। उनका 'नया बसेरा' पूरे गाँव के लिए एक मिसाल बन गया।

निष्कर्ष: आपदा में अवसर

रामदीन की कहानी हमें सिखाती है कि जब जीवन हमें ज़मीन पर पटकता है, तो वह हमें दोबारा, और भी मज़बूती से खड़े होने का मौका दे रहा होता है। रोने से घर नहीं बनते, पसीने की ईंटों से बनते हैं।

इस कहानी से सीख (Moral)

इस कहानी से हमें यह प्रेरणा मिलती है:

  1. हार न मानें: परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विपरीत हों, इंसान का हौसला उसे दोबारा खड़ा कर सकता है।

  2. आत्मविश्वास: दूसरों की दया पर जीने से बेहतर है अपने बाहुबल पर विश्वास करना। 

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